हमारा उद्देश्य

(विश्व को जगाएं) उपक्रम

ATW (विश्व को जगाएं) उपक्रम का विनीत उद्देश्य मानवता का जागरण व आत्म स्वरूप ज्ञान है । हमारे सभी चलचित्र और संचारित ध्यान विधियां आपके लिए निशुल्क उपलबब्ध हैं। इनका विभिन्न भाषाओं में यथासंभव अनुवाद किया जाता है, ताकि यह सांवत्सर ज्ञान सभी के लिए निर्मुक्त उपलब्ध हो सके।

चलचित्र एवं मुद्रित वृत्तचित्र

पुरस्कृत प्रमाणविषयक वृत्तचित्र

ध्यान विधियां

सञ्चारित ध्यान विधियां

सञ्चारित ध्यान विधियां

चाहे आप ध्यान मार्ग में शुरुआत कर रहे हैं या आपका उद्देश्य
अपने ध्यान अभ्यास को गहन करना हैं, निर्देशित ध्यान की इस श्रृंखला को समाधि को प्राप्त करने के लिए आवश्यक एकाग्रता और समता का भाव कर्षण करने के लिए मानित किया गया है।

परिचय

ध्यान के मार्मिक पहलुओं का एक संक्षिप्त अवलोकन तथा  इस श्रृंखला से उत्कृष्ट रूप में प्रवृत्त होने के साधन।

श्वास एक सेतु

श्वास के स्थूल से सूक्ष्म अनुभव का यथातथ मार्गदर्शन

क्लेश

 वेदना, निद्रा एवम, अनवसर चित्त वृतियां  जैसे क्लेशों पर सचेत होकर काम करना उन्हें विघ्नों से अवसरों में परिवर्तित कर देता है। 

प्राण

सांस में दीर्घता से प्रवेश करते हुए, दृष्टा जीवन के सर्पिल में लीन होना प्रारंभ कर देता है।

अपने स्वरूप को जानें

चीर डालें उस सबको को जोकि परिवर्तनशील और समासक्त है। तथा अपने वास्तविक स्वरूप, सम्पूर्णता  को प्राप्त करें।

निर्देशित ध्यान श्रृंखला के खण्ड, प्रथक ध्यान तकनीक नहीं हैं, अपितु श्वास प्रेक्षण का अनंतर  विकसित होता एवं  गहराता हुआ अभ्यास है ।  परम्परागत समाधि तक गहरे ध्यान के माध्यम से ही पहुंचा जाता है।    

यदि आप समाधि की अवस्था को प्राप्त करना चाहते हैं तो प्रत्यक्ष अनुभव के लिए  बौद्धिक समझ से परे जाना आवश्यक है। निर्देशित ध्यान की इस श्रृंखला में, निर्देशित ध्यान में निर्देशों के साथ उचित संबंध स्थापित करना महत्वपूर्ण है। ऐसा समझना चाहिए कि श्वास पर  संयम की तकनीक,  मस्तिष्क से ऊर्जा को हटाने और अपने अस्तित्व के अचेतन पहलुओं में दीर्घ चेतना लाने का एक माध्यम मात्र है। 

यह तकनीक आपके मानसिक या आत्मिक संरचना के अनुपूरक  नहीं है। कोई भी तकनीक एक “काँटा निकालने के लिए प्रयोग किया गया दूसरा काँटा है“। आपको  अपना उद्देश्य पूर्ण होने के पश्चात उसे छोड़  देने को तत्पर होना चाहिए। जैसे – जैसे आप समाधि के समीप पहुंचते हैं, वैसे – वैसे कम चेतस, कम तकनीक और कम अहम, होने लगता है, तब तक, जब तक कि आत्म-संरचना की सभी गतिविधियों का समापन नहीं हो जाता।

 अहम पूर्ण मैं की पहचान का विराम समाधि है, और उस विश्रांति के आयाम में, ज्ञान या  प्रजना का उदय संभव है। 

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चलचित्र

मूल प्रमाणविषयक वृत्तचित्र

हमारी प्रथम पुरस्कृत प्रमाणविषयक वृत्तचित्र फिल्म श्रृंखलाआंतरिक लोक बहिर्लोक (इनर वर्ल्ड्स आउटर वर्ल्डस)को पूरा करने में पांच वर्ष लगे। २०१२ में इसकी रिलीज के बाद इसको तीन करोड़ लोगों तक तीस से अधिक भाषाओं में पहुंचाया जा चुका है । हमारी सबसे नूतन श्रृंखला समाधि चलचित्र को भी व्यापक सत्कार प्राप्त हो रहा हैं। कई अन्य परियोजनाएं पर काम किया जा रहा हैं।

समाधि प्रथम भाग - माया स्वतः का परिकल्पित भ्रम

समाधि एक प्राचीन संस्कृत शब्द है, जिसके लिए कोई आधुनिक समकक्ष उपलब्ध नहीं है। समाधि पर फिल्म बनाने में एक बुनियादी चुनौती निहित हैं। जिस किंचिनता की ओर हम महज़ इशारा कर रहे हैं उसे चेतन के स्तर पर अनूशब्दित नही किया जा सकता।

समाधि द्वितीय भाग - समाधि , आपके चिंतन से परे!

प्राचीन से आधुनिक काल तक विश्व के महानतम आध्यात्मिक गुरुओं ने यही शासित किया कि हमारे होने का सबसे गहरा सत्य किसी एक धर्म या आध्यात्मिक परंपरा की संपत्ति नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में लब्ध है।

आंतरिक लोक बहिर्लोक आवलि प्रथम भाग – आकाश

आकाश है अव्यक्त शून्यता, जो अंतरिक्ष के रिक्त स्थान को भरता है। संत, ऋषि, योगी और अन्य साधक जिन्होंने स्वयं के अंतर में अवलोकन किया है उन्हने अनुभव किया है कि केवल एक स्पंदन स्रोत है जोकि सभी वैज्ञानिक और आध्यात्मिक शोधों का मूल है। जब हम सभी आध्यात्मिक अनुभव के एक ही स्रोत को अनुभव करते हैं, तब हम , ”मेरा धर्म”, “मेरा ईश्वर” या “मेरी खोज” कैसे कह सकते हैं?

आंतरिक लोक बहिर्लोक द्वितीय भाग - कम्बुक चक्र / सर्पिल

पाइथागोरस दार्शनिक प्लेटो ने दृष्टकूट किया एक स्वर्ण कुंजी की ओर जो ब्रह्मांड के सभी रहस्यों की पृणक्ति करती है। प्रत्येक वैज्ञानिक जो ब्रह्मांड में गहराई से दर्शन करता है या प्रत्येक रहस्यवादी जो स्वयं के भीतर अन्वेषण करता है, अंतत: नैसर्गिक कम्बुक चक्र या सर्पिल को अपने समक्ष पाता है।

आंतरिक लोक बहिर्लोक तृतीय भाग सर्प एवं जलज

सर्पिल का निरूपण नीचे की ओर प्रवाहित सर्प शक्ति द्वारा किया जाता है, तथा पक्षी या खिलते हुए कमल का फूल ऊपर परप्रमाता की ओर प्रवाहित शक्ति को प्रतिरूपित करता है । प्राचीन परंपराओं ने ज्ञापित किया है कि इंसान बहिर्लोक से आंतरिक लोक को, स्थूल से सूक्ष्म को तथा निम्न चक्रों से उच्च चक्रों को जोड़ता एक पुल बन सकता है।

आंतरिक लोक बहिर्लोक चतुर्थ भाग चित्तप्रवृति से परे"

 हम अपना जीवन सुख और स्वतंत्रता के परिशीलन में समन कर देते हैं मानो कि वे क्रय वस्तु हों। हम अपनी ही इच्छाओं एवं लालसाओं के आधीन हो गए हैं। यही है माया, भ्रम व रूप की अनन्त लील । जागृति तथा आनन्द की इच्छा करना गलत नहीं है, लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि इन्हें स्वयं के बहिर नहीं पाया जा सकता है।  

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